खाकी पर अपराधियों का रौब, जगह-जगह पिट रही है पुलिस

सरकार को सोचना होगा, पुलिस बल का प्रभाव आम जनता के बीच में कम क्यों होता जा रहा है। आम जनता पुलिस के ऊपर हमले क्यों कर रही है। जिस पुलिस के डर और भय से लोग स्वयं नियंत्रित हो जाते थे, अब वही लोग पुलिस के ऊपर हमला करने से भी नहीं डरते हैं। हाल ही में दर्जनों स्थानों पर पुलिस के ऊपर हमले हुए हैं। वर्दी के पीछे पुलिस कर्मियों की वेदना उनके लिए असहनीय होती जा रही है। वह अपनी वेदना शारीरिक रूप से व्यक्ति भी नहीं कर सकते हैं। पुलिस के ऊपर जिस तरह से राजनीतिक दबाव बढ़ता जा रहा है। राजनीतिक दलों एवं धार्मिक संगठनों के नेता एवं भीड़ जरा-जरा सी बात पर हिंसक आंदोलन खड़े कर देते हैं। आक्रामक तरीके से सड़क एवं धार्मिक स्थलों पर प्रदर्शन करते हैं। विशेष रूप से दो समुदायों के बीच जिस तरह से आरोप प्रत्यारोप का दौर चल पड़ा है। उसके कारण सारे देश में कानून व्यवस्था की स्थिति लगातार खराब होती चली जा रही है। पुलिस बल का रौब भी खत्म होता चला जा रहा है। रमजान का महीना चल रहा है। मुस्लिम समुदाय के रोजा और नमाज को लेकर एक विशेष वर्ग द्वारा लगातार एक धार्मिक समुदाय पर दबाव बनाया जा रहा है। समुदाय विशेष के धार्मिक क्रियाकलापों के संदर्भ में जिस तरह की बातें हो रही हैं। वह कानून व्यवस्था बनाए रखने में पुलिस के लिए बड़ी चुनौती बन रही है। रमजान ओर रामनवमी पर्व एक साथ होने के कारण कुछ संगठनों का उग्र रवैया आग में घी डालने का काम कर रहा है। जिसके कारण कई राज्यों की कानून व्यवस्था की स्थिति दिनों-दिन बिगड़ती चली जा रही है। 300 साल के इतिहास में नागपुर में पहली बार दंगा हुआ। इसका कारण भी पूर्णतः एक वर्ग विशेष के खिलाफ आंदोलन और प्रदर्शन के बाद जिस तरह की स्थिति निर्मित हुई, उसके कारण दंगा हो गया। कर्फ्यू लगाना पड़ा। पुलिस को कानून व्यवस्था नियंत्रित करने के लिए स्वतंत्र रूप से काम करने का मौका नहीं मिलता है। सरकार के दबाव मे काम करना पड़ता है। दो वर्गों के बीच के विवाद में एक वर्ग के खिलाफ मुकदमे दर्ज कर कार्रवाई करनी पड़ती है। एक वर्ग विशेष के मकानों को बुलडोजर से पुलिस की उपस्थिति में तोड़ दिया जाता है। राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण दूसरे पक्ष पर कोई कार्यवाही नहीं होती है। जिसके कारण पुलिस के खिलाफ एक गुस्सा पनपता है। 

मुंबई में एक कॉमेडियन द्वारा एक कार्यक्रम में एक राजनेता के ऊपर व्यंग्य किया गया। उसके बाद एक वर्ग विशेष के लोगों ने कार्यक्रम स्थल पर तोड़फोड़ कर दी। राज्य सरकार और जिला प्रशासन कॉमेडियन के खिलाफ खड़ी हो गई। जिसके कारण मुंबई जैसे स्थान में देखते ही देखते कानून व्यवस्था की स्थिति खराब हो गई। कानून व्यवस्था को लेकर पुलिस के ऊपर कब कहां से मुसीबत आ जाएगी। पुलिस को इसका अंदाजा भी नहीं होता है। पुलिस का खौफ और रोब खत्म होता जा रहा है। पुलिस निष्पक्ष तरीके से कार्यवाही नहीं कर पाती है। एक पक्ष प्रताड़ित होता है, दूसरा पक्ष खुलेआम आक्रामक होकर घूमता रहता है। जिसके कारण पुलिस की स्थिति आम जनता के बीच वह नहीं रही, जो कुछ वर्षों पहले तक देखने को मिलती थी। राजनीति में जिस तरह से अपराधियों को संरक्षण मिल रहा है। राजनीति में अपराधियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। धार्मिक उन्माद भी अपराधों को बढ़ा रहा है। पुलिस चाहकर भी धार्मिक उन्मादियों पर कार्रवाई नहीं कर पाती है। जिसके कारण आम जनता के बीच में पुलिस के खिलाफ विद्रोह पनपने लगा है, जिसका खामियाजा पुलिस कर्मियों को भुगतना पड़ रहा है। अपराधियों को राजनीतिक एवं धार्मिक संरक्षण मिलने के कारण पुलिस की स्थिति दयनीय होती चली जा रही है। पुलिसकर्मियों के ऊपर लगातार हमले बढ़ रहे हैं। जगह-जगह पर सामुदायिक भीड़ तंत्र कानून व्यवस्था के लिए चुनौती बन रहा है। पुलिस स्वयं अपने कामकाज की जिम्मेदारी पूर्ण नहीं कर पा रही है। पुलिस बल अधिकांश मामले में भीड़ को नियंत्रित करने और नेताओं की सुरक्षा में लगा रहता है। जिसके कारण अपराधों की जांच और अपराधियों को पकड़ पाना पुलिस के लिए मुश्किल होता चला जा रहा है। पुलिस एक जांच एजेंसी है। पुलिस की उपस्थिति में लोगों के मन मे सुरक्षा का भाव होता है। लेकिन यह भाव अब धीरे-धीरे खत्म होता चला जा रहा है। पुलिस की मौजूदगी भी लोगों को सुरक्षित महसूस नहीं करा पा रही है। भीड़ के बीच में जब पुलिस ही सुरक्षित नहीं है। ऐसी स्थिति मे लोग पुलिस के ऊपर कैसे भरोसा कर पाएंगे। इसे आसानी से समझा जा सकता है। केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को पुलिस को निष्पक्षता से काम करने की छूट देनी होगी। राजनीतिक और प्रशासनिक हस्तक्षेप खत्म करना होगा। पुलिस निष्पक्षता से कार्रवाई करेगी, तभी पुलिस का भरोसा आम जनता के बीच में बढ़ेगा। कानून व्यवस्था की स्थिति बेहतर होगी। महंगाई, बेरोजगारी, धार्मिक उन्माद, बढ़ते अपराध, नशाखोरी इत्यादि ऐसी समस्या है, जिनके कारण अपराधों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। यह सारा दबाव पुलिस के ऊपर पड़ता है। पुलिस का रौब आम जनता के बीच में बना रहे, पुलिस की इमेज देशभक्ति और जन सेवा की बनी रहे। इसके लिए पुलिस पर राजनीतिक हस्तक्षेप खत्म होना चाहिए। पुलिस को एक स्वतंत्र जांच एजेंसी के रूप में काम करने और कार्रवाई करने के अधिकार मिलें। यदि ऐसा हुआ तो निश्चित रूप से पुलिस का रोब बना रहेगा। कानून व्यवस्था की स्थिति में भी सुधार होगा।  

27 मार्च 25