(10 अप्रैल महावीर जयंती पर विशेष)
भगवान महावीर ने अपने सिद्धांतों में जीवनादर्श को प्रश्रय दिया, जैन धर्म महावीर के काल से सर्वाधिक प्रासंगिक व प्रचलित माना जाता है।
अन्याय, असत्य, हिंसा की कड़कती बिजलियों के मध्य अहिंसा के सूर्य ने दस्तक दी, अपनी तप्त रश्मियों से विश्व शांति, अहिंसा, मैत्री का प्रकाश फैलाकर तमाच्छादित वसुधा को आलोकित कर दिया, युग - युग से अभिशप्त धरा को पावनता का वरदान मिला, गगनचुंबी शिखरों से अहिंसा परमो धर्म:की भावभीनी स्वर लहरिया गूँजकर सुख -शांति की निर्झरणी बहाने लगी, जियो और जीने दो का शंखनाद करने वाले इस महामानव का नाम था महावीर।
महावीर का धर्म जोड़ना सिखाता है, वह आत्मा की प्रयोगशाला में अनुसंधान करके ही किसी तथ्य को स्वीकार करता है। महावीर भारतीय समाज व्यवस्था की उस घड़ी में अवतरित हुए जब समाज व संप्रदाय हिंसा के दौर से गुजर रहे थे। अश्वमेध, नरमेध की बलि बेदी पर संहार राजघराने के राजकुमार वर्धमान को सहन नहीं हुआ, तब महावीर अहिंसा को आत्म कल्याण का हेतु बनाकर, अरबों की संपत्ति त्याग कर, प्राणी जगत का कल्याण करने निकल पड़े।
*अहिंसा*
अहिंसा का अर्थ है क्षमा, शांति, प्रेम पूर्वक रहना । महावीर ने विश्व मैत्री व मानवता का संदेश दिया जिसकी वर्तमान में बहुत आवश्यकता है। आज मनुष्य जरा सी बात पर हत्या जैसे जघन्य अपराध से भी नहीं डरता तभी तो भगवान महावीर ने कहा अपने प्राणों के समान सभी के प्राणों को समझ कर उनकी रक्षा करो यही अहिंसा है उन्होंने अहिंसा को तप और साधना कहा अहिंसा का यह तत्व सह अस्तित्व की नूतन सामाजिक विचारधारा का सोपान है, जिस पर पारस्परिक निर्भरता के साथ व्यक्ति, समाज और राष्ट्र विकसित होता है
*जियो और जीने दो*
भगवान महावीर कहते थे मनुष्य जन्म से नहीं कर्म से महान बनता है परमाणु शक्ति से ज्यादा कारगर मन की शक्ति होती है संग्राम में विजयी योद्धा सच्चा विजयी नहीं है जो स्वयं पर विजय पाता है वह परम विजयी है-
*सादा जीवन, उच्च विचार*
*विनय नम्रता का श्रृंगार*
*जियो और जीने दो नारा*
*होवे जीवन का आधार*।
बारह वर्ष के कठोर तपश्चरण उपरांत करुणामयी वाणी से उन्होंने जन चेतना को जागृत कर समाज में फैली हिंसा, अराजकता, अधर्म के विरुद्ध ऐसा वातावरण बनाया जिससे लोगों का हृदय परिवर्तित होने लगा।
*अनेकांत*
उस समय की निराधार मान्यताओं में महावीर ने वैचारिक क्रांति का सूत्रपात किया, विश्व के समक्ष अत्यंत मौलिक सिद्धांत अनेकांत का प्रतिपादन किया :सहअस्तित्व की भावना।
*अपरिग्रह*
इच्छाएँ अनंत आकाश की तरह हैं जिन पर नियंत्रण आवश्यक है महावीर ने अर्जन के साथ विसर्जन का सूत्र दिया कहा -जिस समाज के पास विलासिता के अपरिमित साधन हों पर कोई उन्नत, आध्यात्मिक लक्ष्य ना हो तो वह समाज प्राण रहित सुंदर शरीर के समान है। महावीर के आप परिग्रह दर्शन का ही फल है व्यवहारिक समाजवाद यह आर्थिक क्षमता स्थापित कर वर्ग संघर्ष और वेमनस्यता का निराकरण करता है लालसाओं पर नियंत्रण आवश्यक है संग्रहवृत्ति जीवन को पत नोन्मुखी बनाती है और अपरिग्रह जीवन को शांति और सुकून प्रदान करता है
*स्वतंत्रता*
महावीर ने पूर्ण स्वतंत्रता की सीख दी थी व्यक्ति स्वतंत्र रहकर स्वयं को पहचाने, आत्म शक्ति को जाने लोकतंत्र का आधार जनता की शक्ति है धार्मिक, सांस्कृतिक, व्यक्तिगत स्वतंत्रता आवश्यक है।
*समानता*
*आत्मवत् सर्वभूतेषु* के सिद्धांत अनुसार जड़, स्थावर, वनस्पति, त्रियंच सभी समान हैं महावीर ने साम्यवाद का उद्घोष किया जो आंतरिक परिवर्तन की प्रेरणा देता है।
*स्यादवाद (सापेक्षता*)
सापेक्षता अर्थात किसी वस्तु के सभी पक्षों को देखना,व्यापक दृष्टिकोण स्थापित कर एकता, समन्वय, सद्भाव से जीवन की सफलता का सूत्र दिया स्यादवाद अभिव्यक्ति शैली है जिसे सात प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है उसे ही महावीर ने सप्तभंगी कहा स्याद अस्ति, स्याद नास्ति, स्याद अस्ति नास्ति, स्याद अवक्तव्यम्, स्याद अस्ति अवक्तव्यम, । महावीर ने विश्व के समक्ष इस मौलिक सिद्धांत का प्रतिपादन किया जो दृष्टि और दृष्टिकोण को समझने में अति उपयोगी है
*आत्मानुशासन*
अपने आप पर नियंत्रण -शरीर, मन, वाणी और सभी इंद्रियों पर संयम रख तप निग्रह द्वारा अनुशासित होना। महावीर का कहना था दूसरों पर शासन मत करो, न स्वयं गुलामी स्वीकार करो ना दूसरों पर गुलामी लादो। आत्म अनुशासन से जीवन स्वयं प्रकाशित होता है
*विश्व बंधुत्व*
वसुधैव कुटुंबकम् के आदर्श का बहुत ही सुंदर प्रतिपादन महावीर ने किया संसार के प्रत्येक प्राणी, जीव जंतु के प्रति समता भाव किसी से द्वेष नहीं, वे सबसे क्षमा प्रार्थी थे-
*खामेभी सब्बजीबे, सव्वे जीवा खमंतु मे*
*मित्ती में सब्ब भू एसु,वैरं मज्झ न केणई*।
भगवान महावीर का यह विश्व बंधुत्व का संदेश राष्ट्रीयता, एकता व लोकतंत्र की सफलता के लिए आवश्यक तत्व है प्रगति सदैव सद्भावों से होती है ।महावीर के सिद्धांत वर्तमान परिप्रेक्ष्य में वह प्रकाशमय सूर्य है जो सारे जगत को आलोकित कर देता है।
*रत्नत्रय*
भगवान महावीर न्याय और दर्शन के प्रणेता थे, उनका रत्नत्रय सम्यक दर्शन सम्यक ज्ञान व सम्यक चारित्र अंधपरंपरा, रूढ़िवादिता, कर्मकांड आदि को छोड़कर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विकास किया जाए । परीक्षण, निरीक्षण एवं स्वविवेक से प्रत्येक वस्तु को जानकर व्यक्ति आत्मविश्वास के साथ सतत जागरूकता से आदर्श समाज का निर्माण कर सकते हैं और वर्तमान समस्याओं का सम्यक समाधान प्रस्तुत कर सकते हैं।
*समग्रता*
महावीर का धर्म समग्र है घर, मंदिर, व्यवसाय, चर्या में किए कर्म में ही धर्म छुपा है जो कुछ करो वह विवेक पूर्ण हो महावीर अविभाज्य व्यक्तित्व चाहते थे।
महावीर के उपदेशों को जब तक हम अपने आंतरिक जीवन में नहीं उतारेंगे तब तक व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र व विश्व का उद्धार नहीं होगा हम महावीर के सिद्धांतों को जन-जन में प्रचारित करें और स्वयं में उतारें तभी कल्याण हो सकता है भगवान महावीर के आदर्श हमारी आज की समस्याओं का सम्यक समाधान प्रस्तुत करते हैं
*पावन होती धरा जहाँ से*
*धर्म का पंथ निकलता है*
*दया, प्रेम, करुणा समता से*
*महावीर का युग चलता है*
महावीर के सिद्धांत शाश्वत हैं, जो आज भी तरोताजा हैं, ये आज कीआवश्यकता हैं, विश्व में व्याप्त विषमताओं, समस्याओं, भय,व त्रासदियों को महावीर के सिद्धांतों पर चलकर ही दूर किया जा सकता है ।
*महावीर के सिद्धांतों को*
*आओ हम सब अपनायें*
*सत्य, अहिंसा, दया, प्रेम से*
*जीवन अपना सफल बनायें*।
09 अप्रैल 25
